Tuesday, June 30, 2009

दोस्ती कुछ कहता है...

दोस्ती कुछ कहता है...

मत इंतज़ार कराओ हमे इतना की
वक़्त के फैसले पर अफ़सोस हो जाए
क्या पता कल तुम लौटकर आओ
और हम खामोश हो जाएं.......

दोस्ती खिलते फूलों कि खुशबु में है
दोस्ती ढलते सूरज कि किरणों में है
दोस्ती हर नए दिन कि उम्मीद है
दोस्ती ख्वाब है, दोस्ती जीत है
दोस्ती प्यार है, दोस्ती गीत है
दोस्ती दो जहानो का संगीत है
दोस्ती हर ख़ुशी है, दोस्ती जिन्दगी है
दोस्ती रोशनी है, दोस्ती बंदगी है
दोस्ती संग चलती हवाओं में है
दोस्ती इन बरसती घटाओं में है
दोस्ती दोस्तो कि वफाओं में है
हमारी दोस्ती बनी रहे, दोस्ती यही कहता है....

दोस्त के लिए प्यारा सा कलाम
मैं दुआ करता हूँ कि सफलता आपके कदम चूमे , आपका संसार खुशियों से भरा रहे , हमारी दोस्ती जिन्दगी भर बनी रहे और आप सदा यूं ही मुस्कुराते रहे ।

दूरियों से फर्क पड़ता नहीं
बात तो दिलों कि नज़दीकियों से होती है
दोस्ती तो कुछ आप जैसो से है
वरना मुलाकात तो जाने कितनों से होती है
दिल से खेलना हमे आता नहीं
इसलिये इश्क की बाजी हम हार गए
शायद मेरी जिन्दगी से बहुत प्यार था उन्हें
इसलिये मुझे जिंदा ही मार गए ।
लोग मोहब्बत को खुदा का नाम देते है,
कोई करता है तो इल्जाम देते है।
कहते है पत्थर दिल रोया नही करते,
और पत्थर के रोने को झरने का नाम देते है।
भीगी आँखों से मुस्कराने में मज़ा और है,
हसते हँसते पलके भीगने में मज़ा और है,
बात कहके तो कोई भी समझा लेता है,
पर खामोशी कोई समझे तो मज़ा और है.......

मुस्कराना ही ख़ुशी नहीं होती,
उम्र बिताना ही ज़िन्दगी नहीं होती,
दोस्त को रोज याद करना पड़ता है,
क्योकि दोस्त कहना ही दोस्ती नहीं होती........
फूलों सी नाजुक चीज है दोस्ती,
सुर्ख गुलाब की महक है दोस्ती,
सदा हँसने हँसाने वाला पल है दोस्ती,
दुखों के सागर में एक कश्ती है दोस्ती,
काँटों के दामन में महकता फूल है दोस्ती,
जिंदगी भर साथ निभाने वाला रिश्ता है दोस्ती,
रिश्तों की नाजुकता समझाती है दोस्ती,
रिश्तों में विश्वास दिलाती है दोस्ती,
तन्हाई में सहारा है दोस्ती,
मझधार में किनारा है दोस्ती,
जिंदगी भर जीवन में महकती है दोस्ती,
किसी-किसी के नसीब में आती है दोस्ती,
हर खुशी हर गम का सहारा है दोस्ती,
हर आँख में बसने वाला नजारा है दोस्ती,
कमी है इस जमीं पर पूजने वालों की वरना
इस जमीं पर भगवान है दोस्ती ।


ऐसा दोस्त चाहिए जो हमे अपना मान सके,जो हमारे दिल को जान सके,चल रहे है हम तेज़ बारिश मे,फिर भी पानी मे से आँसुओ को पहचान सके.....ख़ुश्बू की तरह मेरी सांसो मे रहनालहू बनके मेरी नस नस मे बहना,दोस्ती होती है रिश्तो का अनमोल गेहनाइसलिए दोस्ती को कभी अलविदा ना कहना.....दोस्ती सच्ची हो तो वक़्त रुक जाता है॥आसमान लाख ऊँचा हो मगर झुक जाता है...दोस्ती में दुनिया लाख बने रुकावट,अगर दोस्त सच्चा हो तो दुनिया भी झुका देता है...दोस्ती वो एहसास है जो मिटता नहीं...दोस्ती पर्वत है वो, जो झुकता नहीं।,इसकी कीमत क्या लगायेगी दुनिया,यह वो अनमोल मोती है जो बिकता नहीं....सच्ची है दोस्ती आज़मा के देखो,करके यकीन मुझपे मेरे पास आके देख लो,बदलता नहीं कभी सोना अपना रंग,चाहे जितनी बार आग में जला के देखलो आपसे दोस्ती हम यूं ही नही कर बैठे,क्या करे हमारी पसंद ही कुछ "ख़ास" है। .चिरागों से अगर अँधेरा दूर होता,तोह चाँद की चाहत किसे होती.कट सकती अगर अकेले जिन्दगी,तो दोस्ती नाम की चीज़ ही न होती.कभी किसी से जीकर ऐ जुदाई मत करना,इस दोस्त से कभी रुसवाई मत करना,जब दिल उब जाए हमसे तो बता देना,न बताकर बेवफाई मत करना.दोस्ती सची हो तो वक्त रुक जता हैअस्मा लाख ऊँचा हो मगर झुक जता हैदोस्ती मे दुनिया लाख बने रुकावट,अगर दोस्त सचा हो तो खुद बन जाता है॥


दोस्ती यही कहता है सच्चा दोस्त खुद बनजाता है........।

Thursday, June 25, 2009

नारी की दशा व दिशा


नारी की दशा व दिशा

सरकार और मीडिया महिला सशक्तिकरण की बहुत बातें करते हैं। नामचीन महिलाओं का उदाहरण देकर कहा जाता है कि महिला अब पुरूषों से कमतर नहीं हैं। लेकिन जब किसी गरीब, लाचार और बेबस लड़की के बिकने की दास्तान सामने आती है तो महिला सशक्तिकरण की धज्जियां उड़ जाती हैं। बड़ी-बड़ी बातें सब दिखावा बन कर रह जाती है। ऐसी ही घटना पश्चिम बंगाल की 25 साल की मौसमी का है जिसे पश्चिम बंगाल से खरीदकर लाया गया। उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। जब मौसमी को अपने बेचे जाने की भनक लगी तो वह किसी तरह दरिंदों के चंगुल से निकल कर भागी। लड़की को मेरठ थाना लाया गया। लड़की केवल बंगला में ही बातें कर रही थी। 'संकल्प' संस्था की निदेषक श्रीमती अतुल शर्मा थाने पहुंचकर कलकत्ता स्थित अपने एक कार्यकर्ता से मौसमी की बात करायी। कार्यकर्ता ने हिन्दी में मौसमी की व्यथा को बयान किया। इससे पहले भी मेरठ में लड़कियां के बिकने की खबरें आती रही हैं। संकल्प की अतुल शर्मा बताती हैं कि मेरठ लड़कियों की खरीद-फरोख्त की मंडी बन चुका है। श्रीमती अतुल बताती हैं कि वे अब तक 131 लड़कियों को बिकने से बचा चुकी हैं। लड़कियों को दिल्ली के जीबी रोड तथा मेरठ के कबाड़ी बाजार स्थित रेड लाइट एरिया मे खपाया जाता है।दरअसल, मेरठ ही नहीं, पूरा पश्चिमी उत्तर प्रदेश लड़कियों की खरीद-फरोख्त और देह व्यापार का अड्डा बन गया है। ये लड़कियां नेपाल, असम, बंगाल, बिहार, झारखंड मध्य प्रदेश तथा राजस्थान आदि प्रदेशों से खरीदकर लायी जाती हैं। जिनमें अधिकांश लड़कियां गरीब परिवार की होतीं हैं। पश्चिमी यूपी में लगभग 6 हजार महिलाएं तस्करी से लाकर बेची जा चुकी हैं। इनमें से कुछ 15 से 16 तथा कुछ 20 से 22 साल की आयु की थीं। जानकारी के मुताबिक झारखंड के लोगों के लिए मेरठ मंडल ही यूपी है। झारखंड के बोकारो, हजारी बाग, छतरा और पश्चिम सिंहभूम जिलों में महिलाओं की हालत सबसे खराब है। इन्हीं जिलों से महिलाओं की तस्करी सबसे अधिक होती है।
मेरठ की बात करें तो पिछले दिसम्बर 2007 तक सरकारी आंकडों के अनुसार 419 बच्चों के गायब होने की रिपोर्ट है। इनमें से विभिन्न आयु वर्ग की 270 लड़कियां हैं। लड़कियों के बारे मे पुलिस शुरूआती दिनों में प्रेम प्रसंग का मामला बनाकर गम्भीरता से जांच नहीं करती । दूसरी तरफ निठारी कांड में गायब हुए बच्चों की तलाश के लिए बड़ी-बड़ी बातें की गयी थीं। लेकिन निठारी कांड पर धूल जमने के साथ ही गायब हुऐ बच्चों की तलाश पर भी ग्रहण लग गया है। मेरठ महानगर के रेड लाइट एरिया में लगभग 1800 सैक्स वर्कर थीं। इनमें लगभग 1160 केवल 12 से लेकर 16 वर्ष की नाबालिग बच्चियां हैं, जिन्हें अन्य प्रदेशों से लाकर जबरन इस धंधे में लगाया गया है। जब से यह कहा जाने लगा है कि कम उम्र की लड़कियों से सम्बन्ध बनाने से एड्स का खतरा नहीं होता, तब से बाल सैक्स वर्करों की संख्या में इजाफा हुआ है। देह व्यापार में उतरते ही इन लड़कियों के शोषण का अंतहीन सिलसिला शुरू हो जाता है। दलालों और कोठा संचालकों का उनकी हर सांस और गतिविधि पर कड़ा शिकंजा रहता है। यदि कोई लड़की भागने की कोशिश करती है तो उस पर भयंकर अत्याचार किए जाते हैं। शारीरिक हिंसा, लगातार गर्भपात, एड्स, टीबी तथा हैपेटाइटिस बी जैसी बीमारियां इनका भाग्य बन जाती हैं। मेरठ के रेड लाइट एरिया में ऐसी अनेकों लड़कियां हैं, जो इस धन्धे से बाहर आना चाहती हैं। लेकिन माफिया उन्हें धन्धे से बाहर नहीं आने देना चाहते। वे अगर बाहर आ भी जाती हैं तो उनके सामने सबसे सवाल यह रहता है कि क्या समाज उन्हें स्वीकार करेगा। पिछले दिनों मेरठ के रेड लाइट एरिया की जूही नाम की सैक्स वर्कर ने सुरेश नाम के लड़के से कोर्ट मैरिज कर ली। लेकिन कोठा संचालिका और दलालों को जूही का शादी करना अच्छा नहीं लगा। उसे जबरदस्ती फिर से कोठे पर ले जाने का प्रयास किया गया, जो असफल हो गया। लेकिन जूही एक अपवाद मात्र है। धन्धे से बाहर आने की चाहत रखने वाली हर सैक्स वर्कर की किस्मत जूही जैसी नहीं होती। अपने लिए दुल्हन खरीद कर लाये एक अधेड़ अविवाहित ने बताया कि दिल्ली में एक दर्जन से भी अधिक स्थानों से नेपाल, बिहार, बंगाल, झारखंड तथा अन्य प्रदेशों से लायी गयी लड़कियों को मात्र 15 से 20 हजार में खरीदा जा सकता है।' दिल्ली में यह सब कुछ प्लेसमेंट एजेंसियों' के माध्यम से हो रहा है। इन्हीं प्लेसमेंट एजेंसियों के एजेन्ट आदिवासियों वाले राज्यों में नौकरी-रोजगार देने का लालच देकर लाते हैं और उन्हें जरूरतमंदों को बेच देते हैं। ये एजेंसियां इन लड़कियों के नाम-पते भी गलत दर्ज करते हैं ताकि इनके परिवार वाले इन्हें ढूंढ न सकें। अधेड़ लोग सन्तान पैदा करने के लिए तो कुछ मात्र अपनी हवस पूरी करने के लिए इन लड़कियों को खरीदते हैं।
कुछ सालों के बाद इन लड़कियों को जिस्म फरोशी के धंधे में धकेलकर दूसरी लड़की खरीद ली जाती है। कुछ पुलिस अधिकारी यह मानते हैं कि लड़कियों को बंधक बनाकर उन्हें पत्नि बनाकर रखा जाता है, लेकिन लड़की के बयान न देने के कारण पुलिस कार्यवाई नहीं कर पाती है। लड़कियों की खरीद-फरोख्त तथा देह व्यापार एक चुनौती बन चुका है। इस व्यापार में माफियाओं के दखल से हालात और भी अधिक विस्फोटक हो गये हैं। सैक्स वर्करों को जागरूक करने का कार्य करने वाले गैर सरकारी संगठनों को इन माफियाओं से अक्सर जान से मारने की धमकी मिलती रहती है। कुछ जातियों में देह व्यापार को मान्यता मिली हुई है। यदि ऐसी जातियों को छोड़ दिया जाये तो देह व्यापार में आने वाली अधिकतर लड़कियां मजबूर और परिस्थितियों की मारी होती हैं। प्यार के नाम ठगी गयीं, बेसहारा और विधवाएं होती हैं। किसी देश की अर्थ व्यवस्था चरमरा जाना भी देह व्यापार का मुख्य कारण बनता है। सोवियत संघ के विघटन के बाद आजाद हुऐ कुछ देशों की लड़कियों की भारत के देह बाजार में आपूर्ति हो रही है। एक दशक पहले से नजर डाला जाए तो दिल्ली, कोलकाता, चैन्नई, बंगलौर और हैदराबाद में सैक्स वर्करों की संख्या लगभग सत्तर हजार थी। एक दशक बाद यह संख्या क्या होगी इसकर केवल अंदाजा लगाया जा सकता है।देह व्यापार में केवल गरीब, लाचार और बेबस औरतें और लड़कियां ही नहीं हैं। देह व्यापार का एक चेहरा ग्लैमर से भरपूर भी है। सम्पन्न घरों की वे औरतें और लड़कियां भी इस धन्धे में लिप्त हैं, जो अपने अनाप-शनाप खर्चे पूरे करने और सोसाइटी में अपने स्टेट्स को कायम रखने के लिए अपनी देह का सौदा करती हैं। भूमंडलीकरण के इस दौर में नवधनाढ़यों का एक ऐसा वर्ग तैयार हुआ है, जो नारी देह को खरीदकर अपनी शारीरिक भूख को शांत करना चाहता है। इन धनाढ़यों की जरूरतों को पूरा करने का साधन ऐसी ही औरतें और लड़कियां बनती हैं।समाज का एक बर्ग यह भी मानता है कि रेड लाइट एरिया समाज की जरूरत है। इस वर्ग के अनुसार भारत की आबादी का लगभग आधा हिस्सा युवा है और इस युवा वर्ग के एक बड़े हिस्से को अनेक कारणों से अपनी शारीरिक जरूरत पूरी करने के लिए रेड लाइट एरिया की जरूरत है। सर्वे बताते हैं कि जहां रेड लाइट एरिया नहीं हैं, वहां बलात्कार की घटनाओं में इजाफा हुआ है।
सैक्स वर्करों की बीच काम करने वाली गैर सरकारी संस्थाओं के सामने देह व्यापार को छोड़कर समाज की मुख्य धारा में आने वाली लड़कियों का पुनर्वास एक बड़ी चुनौती होता है। हालांकि सरकार सैक्स वर्करों के पुनर्वास के लिए कई योजाएं चलाती है। लेकिन सैक्स वर्करों के अनपढ़ होने, स्थानीय नहीं होने तथा दलालों के भय से वे योजना का लाभ नहीं उठा पाती हैं। कुछ गैर सरकारी संगठन वेश्यावृत्ति के उन्मूलन के लिए सार्थक प्रयास तो कर रहे हैं लेकिन उन्हें समाज, प्रशासन और पुलिस का उचित सहयोग और समर्थन नहीं मिल पाता। गैर सरकारी संगठनों को व्यापक शोध करके सरकार को सुझाव दें कि जो लड़कियां देह व्यापार से बाहर आना चाहती हैं, उनका सफल पुनर्वास कैसे हो तथा सरकार को भी इस समस्या को ध्यान मे रखकर कोई ऐसा कानून लाए जिससे आने वाले समय में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके। इस सब के पीछे नारी भी कम जिम्मेदार नहीं है जो अपने फैशन के आड़ में अपनी जिंदगी को बर्बाद करते हैं ।

Saturday, October 4, 2008

मुस्कान

मुस्कान


''किसी की मुस्कराहटों पर हो निसार..........किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार .जीना इसी का नाम है '' यह गाने की पंक्ति देती है........एक छोटी सी मुस्कराहट जो जिंदगी में बदलाव लाती है हँसाना,हँसना और मुस्कराना तनाव भरी जिंदगी में बहुत जरुरी है । नही तो जिंदगी अवसाद की हालत तक पहुच जाती हैं क्योंकि जिंदगी है तो मुश्किलें तो होंगी ही क्यों ना इसे मुस्करा कर हल किया जाए । बहुत से ऐसे लोग हैं जिनका सिर झुका हुआ ,मुहं लटका हुआ ,चेहरा खींचा हुआ मानो ख़ुद तो तनाव ग्रस्त होते ही हैं आस पास के माहौल भी बोझिल बना देते हैं । उन्हें देख कर ऐसा लगता है कि दुनिया कि सारी समस्या का बोझ बस उन्ही के सर पर है । हँसी और मुस्कराने से उनका कोई रिश्ता नाता ही नही तो बतायें अब ऐसे लोगो से कौन मिलना चाहेगा । कौन उनसे बात करके अपना मूड ख़राब करेगा । जरूरत है आपका चेहरा यूँ मुसकराता हुआ होना चाहिए कि बस जो आपसे मिले आपको देखे वह आपका ही हो कर रह जाए ।
किसी की बातें अच्छी, मीठी, सकारात्मक हो तो उनसे बात करने को ख़ुद ही जी चाहता है क्योंकि एक मुस्कराहट आपके चेहरे पर एक मुस्कान खिला देती है जिससे दिल खुश हो जाता है और नए ताजे विचार जहन में लिखने के लिए कुलबुलाने लगते हैं । आपकी मुस्कान का स्वास्थ से गहरा सम्बन्ध हैं क्योंकि वैज्ञानिक भी कहते हैं कि अपने खोये हुए स्वास्थ को लौटाने का मूल मन्त्र है खुशी और मुस्कान है । मुस्कराने से दिल मस्तिष्क हमारा श्वसन तंत्र ,पाचन तंत्र सब स्वस्थ और सक्रीय रहते हैं । घर के बुजुर्ग कहते हैं कि हँसते मुस्काराते लोग कभी बीमार नही पड़ते हैं ।क्योंकि उन में रोग से लड़ने की ताकत ज्यादा होती है ।

आपकी एक मुस्कराहट किसी का दिल जीत सकती है ,कोई बिगडा हुआ काम बना सकती है । आपकी एक मुस्कराहट से घर में खुशी का उजाला फैल सकता है । इसलिए आप हमेशा मुस्कुराते हैं और जिंदगी के हसीन पल को बीताते रहें ।

:- Vikash kumar shresth

यह कैसी धारणा है

यह कैसी धारणा है

कुष्ठ रोग को लेकर अनेक सामाजिक भांतियां भारतीय समाज में अब भी मौजुद है और कई लोग अब भी कुष्ठ रोग को एक दैवी अभिशाप मानते हैं । जिसके कारण इसके रोगियों को तिरस्कार झेलना पडता है । दुनिया भर के कुष्ठ रोगियों में 70 प्रसिशत रोगी भारत में रहते हैं । सामाजिक बुराई का एक यह भी नमूना समाज में व्याप्त है जहां कुष्ठ रोगीयों को समाज में रहने नही दिया जाता है और उनके खिलाफ जो भांतियां फैली हुई है कि कोई भी कुष्ठ रोगीयों के साथ रहना नही चाहता यहां तक की उन्हें समाज से निष्कार्षित भी कर दिया जाता है । जिससे उन्हें निर्वासन की जिंदगी जीने के लिए मजबूर किया जाता था । इस बिमारी को दूर करने का तरीका है तो लोगों में जागरूकता लाना , ताकि लोग इनके साथ भेदभाव की भावना ना रखे । इनके ऊपर ऐसी भी कहानियां व्याप्त है कि लोग कुष्ठ रोगियों से इतना डरने लगते है कि उन्हें जिंदा जलाने या जिंदा दफन करने में परहेज नही करते हैं ।

गौरतलब है कि भारत के कई हिस्सों में गलत धारणा के कारण कुष्ठ रोगियों के साथ अभी भी भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाता है । अधिकांश लोगों का मानना है कि यह बिमारी ठीक नही हो सकती है और इससे दूसरे लोग भी प्रभावित हो सकते हैं । भारत सरकार जहा कुष्ठ रोगियों को न तो छुआछूत और ना ही वंशानुगत मानती है । उनका कहना है कि कुष्ठ रोग संक्रामक है , लेकिन उसका संक्रामक को लेकर आंतक अधिक है , वास्तविक खतरे बहुत कम । यह रोग तब फैल सकता है जब तक इसका इलाज एक बार भी ना हो सका है क्योंकि एक बार इलाज कराने के बाद इस रोग के फैलने का सम्भावना नही होती है । कुष्ठ रोगियों को समाजिक दंस भी झेलना पडता है और उन्हे समाज से निकाल भी दिया जाता है । ऐसा प्रताडना सामाजिक अभीशाप नही तो और क्या हो सकता है ?

देश में दर्जन भर से अधिक कानून बने है वह भी इसे रोक पाने में असमर्थ हैं जिससे भेदभाव की भावना बढ जाती है । बात कानून की हो तो देखा जाए कि भारतीय रेल अधिनियम की धारा 56 में जो प्रावधान है उलके अंर्तगत कुष्ठ रोग ग्रस्त व्यक्ति को रेल यात्रा करने का प्रावधान नही है यहां तक की विवाह अधिनियम में तलाक का भी प्रावधान है । हम यह जानते हुए भी ऐसी गलती करते है जो समाज और देश के लिए सही नही है । समाज के गलत अवधारणा के कारण वे लोग अपनी बस्ती अलग बनाकर रहते है यहां तक कि ऐसे भी कुष्ठ रोगी है जो हजारों की संख्या में सडकों के किनारे अपना जीवन गुजार रहे हैं ।

हम जान कर भी अनजान बने बैठे हैं क्योंकि हमें दुख हो रहा है कि घर परिवार,समाज और सरकार सभी ने इनके साथ सौतेला व्यवहार किया है और इन्हें मिला है तो इनसे सीर्फ दुत्कार जिसका परिणाम आज हम सभी के सामने हैं । हम इनके नाम से करोडों, अरबों रूपए खर्च कर देते हैं फिर भी इन्हें सडक के किनारे रहना पडता है । आखिर यह कैसा न्याय है । समाज में इन्हें चुनाव लडने तक का प्रतिबंध है जो पूरी तरह से यह असंवैधानिक है । आज स्थति ऐसी है कि संविधान के मौलिक अधिकार में जो अधिकार दिए गए है उससे भी ये लोग वंचित हैं । इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि हम सभी जान कर भी अनजान बने बैठे है । आखिर समाज और देश से यह भेदभाव कब मिटेगा यह आने वाला समय ही बतायेगा ।

Wednesday, September 24, 2008

मंहगी हुई शिक्षा

मंहगी हुई शिक्षा

छोटे छोटे मासुम बच्चे जिनके आखो में सपने होते है लेकिन उनका सपना कैसे पुरा हो यही सवाल हम सब के सामने है । ज़िंदगी की एक ऐसी सच्चाई जहा एक तरफ अमीरी तो दुसरी तरफ गरीबी ,पर उम्मीद किसी बडे या अमीर घरो में ही नही गरीब घरो में भी होती है जहाँ हर कोई अपने बच्चे के उज्जवल भविष्य की कामना करते है ।

ऐसे कई परिवार है जिनकी ज़िंदगी दो वक्त की रोटी जुटाने में ही खत्म हो जाती है लेकिन समय के भागते दौड में उनकी सोच तथा सरकार का एक सफल प्रयास उन गरीब मासुम बच्चो के लिए एक नया सपना लेकर आती है ,वह सरकार की सफल योजना मिड डे अथार्त बच्चो की शिक्षा के प्रति जागरूकता का एक सफल प्रयास है जहाँ बच्चो को दोपहर में भोजन खिलाया जाता है इतना ही नही पढने के लिए कौपी किताब तक दी जाती है ताकि अधिक से अधिक बच्चे इसका फायदा उठा सके ।

दुसरी तरफ बात करे उन प्राईवेट स्कुलो की बात करें तो वो सीर्फ अमीर बच्चों के लिए है क्योंकि यहां सीर्फ अमीर बच्चे ही पढ सकते हैं गरीब नही जो इन गरीब बच्चों से कौसो दुर भाग रही है अर्थात गरीब बच्चो के लिए सपना देखना दिन में तारे गिनने के बराबर है लेकिन जरूरत है इन गरीब बच्चों के लिए हौसला ,हिम्मत और लगन की जो इस बच्चो को सफलता से कोई नही रोक सकता । आए दिन समय इतना भयावह होता जा रहा है कि बच्चे अपने शिष्ठाटार को भुलते जा रहे है जिंदगी के बदलाव ने उन्हे इन चीजों से महरूम कर दिया है जिससे संस्कार उनसे कौसो दुर भाग रही है कारण परिवार का टूटना और बच्चों को कम उम्र में अपनों से दूर रखना ।इतना ही नही बच्चों पर बढते अत्याचार ने हम सभी के सामने एक समस्या खडी कर दी है जहां हम सभी परेशान है चाहे शिक्षक की करतूत हो चाहे उनका कतवर्य से विमुख होना । बच्चे इतने मासुम होते है की इन अत्याचार को भी सह लेते है लेकिन इनकी दर्द की सच्चाई को कोई जानने नही आया । आज देखा जाए तो यह एक गंभीर समस्या बन कर हम सभी के सामने है । इसलिए तो सवाल कई है पर जवाब उन सवालो के सामने कम परते जा रहे है आखिर क्या होगा इन बच्चों का..............।

Saturday, September 20, 2008

ये कैसी जिंदगी जी रहे हैं हम

ये कैसी जिंदगी जी रहे हैं हम


जिंदगी इतनी सस्ती हो गयी है जहां सिर्फ दिखते हैं आतंक का मंजर जिसके चपेट मे देश के मासूम लोग । हम बेबस और लाचार हो चुके हैं इस आतंक से जहां लोगों के आंखों में आंसू , बहते हैं खून और हर ओर आंसुओं का सैलाब। टेलीविजन पर रोते हुए चेहरे। अखबारों में खून से लथपथ, चीखते बिलखते चेहरे। हर जगह देखा तो दहशत ही दहशत मानो लोग डर के साये में जी रहे हैं भला ऐसे माहौल में कोई भी व्यक्ति सामान्य कैसे रह सकता।
हर कोई दिल्ली के जज्बे को सलाम कर रहा है तो कोई इसकी दिलेरी की दाद दे रहा है। सडकों पर अपनो का खून बह रहा है तो हर घर से खुशियों के रंग को कोई चुरा कर ले जा रहा है छायी हुई है तो सीर्फ उदासी फिर भी दाद देनी होगी दिल्ली की दिलेरी की कि जिसने आतंकवाद के सामने सिर नहीं झुकाया और संभल गई। ये सभी मन बहलाने की बातें लगती है। जिनके घर के चिराग बुझ गए, किसी ने अपना बेटा खो दिया, किसी ने अपना पति खो दिया तो किसी ने अपना पिता खो दिया, कई अब भी लापता हैं और कई अपने घायल परिजनों को लेकर अस्पताल दर अस्पताल भटकने को मजबूर हैं जो आज तक नही संभल पाए हैं , तो कहां संभल गई है दिल्ली ? शायद वो अब जिंदगी भर नहीं संभल पाए क्योंकि तीन साल पहले हुए धमाकों के पीड़ित भी अभी तक कहां संभल पाए हैं।
दिल्ली दिलेर नहीं है, शायद असंवेदनशील है। शनिवार को धमाका। रविवार को छुट्टी। सोमवार से सामान्य ज़िंदगी मानो कहीं कुछ हुआ ही नहीं। आखीर आप इसे क्या कहेगें, आतंकवाद पर दिल्ली की जीत , इससे क्या फ़र्क पड़ता है। इससे उनका दर्द तो कम नहीं हो जाता, धमाकों ने जिनकी जिंदगी तबाह कर दी है।
हम बारूद की ढेर पर खडे है जहां जिंदगी कब है और कब नहीं कोई नही जानता बस सब कुछ चल रहा है तो भगवान भरोसे । वह दिन मानो हमारे लिए मुश्किल का वक्त था जहां घर से पापा एंव मम्मीजी का फोन प्रत्येक 15 मिनट पर बार बार आता रहता था और सीर्फ एक ही सवाल होता , कहां हो बेटा ? तुम ठीक तो हो ना , मेरी आवाज सुनते ही एक पल के लिए राहत की सांस लेती है कि चलो अभी तक उनका बेटा सुरक्षित है । तब वह गहरी सांस भरते हुए कहती कहीं मत जाना , फोन करते रहना और अपना ख्याल रखना । यह स्थति पुरे दिल्ली और एनसीआर की है। जहां हर आदमी डरा हुआ है क्योंकि हम सभी डरे हुए शहर में डरे हुए लोगों के बीच हम रह रहे हैं। पता नहीं कब कहां क्या हो जाय ? हम सभी इतने डर गये है कि बाजार में कुछ खरीदने में भी डर , मानो खुशियाँ भी इस डर में खो चुकी हो और जी रहे तो संगीनों के साए में डरते हुए। जहां केवल डर, डर और सिर्फ डर ?
आतंक के साये में जहां देखता हूं दहशत नजर आ रही है समझ में नही आता आखिर यह क्या हो रहा है , क्यों हो रहा है और कौन कर रहा है आखिर उसे क्या चाहिए, मासूमों की जान से खेलकर , क्या मिल रहा है उसे । हर जगह खुशियाँ क्यों मातम में बदल रही है जहां चेहरों पर हंसी बन गयी है सीर्फ उदासी । हर जगह देख रहे है तो बारूद ही बारूद जहां लोगों की सुनाई दे रही है तो सिसकियों से भरी आह । मरने वालो को कौन देख रहा है न प्रशासन और नही सरकार आखिर कब तक मरते रहेगें ये निर्दोश लोग क्योंकि प्रशासन हो या सरकार मरने वालों की लगा देते है किमत एक लाख या पांच लाख , क्या ये किमत इनकी जिंदगी से ज्यादा है बस यही तो आज तक होता आया है। अपनो की यादो में लोगों की आंसू सूख गये हैं आंखों से ,आवाज गुम हो गयी है तो दूर-दूर तक आशा की कोई उम्मीद दिखाई नहीं पड रही है, फिर भी हम सभी जिंदगी को जीये जा रहे हैं पता नही किसके सहारे। आखिर कैसी जिंदगी जी रहे हैं हम.............।

Tuesday, September 9, 2008

नशा बना समाज के लिए अभिशाप

नशा हमारे समाज के लिए सबसे बडा कलंक है क्योंकि हमारे समाज में नशे का आतंक बढता जा रहा है । जिसका शिकार आज के युवा पीढि हो रहे हैं । उनमें अधिकांश स्कूल कालेज में पढने वाले बच्चे शामिल हैं । नशा का प्रयोग लोग खुशियों या गमों मे दोनों में करते है, जो हमारे लिए नुकशानदेह है । कहते हैं कि नशा करने पर लोगों को सकुन सा अनुभव होता है । उसे भी एक अजीब सी खुशी का एहसास होता है । नशा का प्रयोग अधिक मात्रा मे लोग करने लगे तो वह नशा का गुलाम बन जाता है जिसे नही मिलने पर वह पूरी तरह परेशान हो जाता है जैसे जल के बिना मछली । जो इसके लिए यह नशा मौत बनकर सर पर मडराने लगती है ।

समय के भागते-दौड मे लोग इतने व्यस्त हो गए है कि आए दिन पारिवारीक तथा काम का बोझ के साथ पैसे कमाने की ललक में मानसिक एवं शारीरिक रूप से परेशान हो जाते है । जिसके कारण वे परेशानियों से बचने के लिए नशा का प्रयोग करते हैं । नशा चाहे बीडी-सिकरेट, तम्बाकू ,शराब की हो या अफीम, गांजा हरोइन और स्मैक की सभी तो नशीली पर्दाथ ही हैं जो लोगों को कमजोर बना देता है । नशा के आदि लोग नशा पर इतने आश्रित हो जाते है कि उसके बिना उसकी जिंदगी अधूरा है मानो वह मौत को बुला रहा है । समाज हो या हमारी सरकार इन सभी को देख रही है फिर भी हाथ पर हाथ रखे बैठे हैं जो नशा को रोकने मे असफल साबित हो रहे हैं । आखिर सवाल यह है कि इस नशा पर अंकुश कैसे लगाया जाए , जहां जान कर भी अनजान बने बैठे हैं, रोकने के बजाए तमाशबीन बने इस हालात को देखे जा रहे हैं । अगर इस समस्या पर ध्यान ना दिया गया तो अगामी दिनों में हमारा भारत नशेडियों का भारत बन जाएगा ।

नशा की चपेट मे पंजाब की तरह दिल्ली भी अछूता नही रहा है ,जहां हाल फिलहाल 500 करोड रूपए का मादक पर्दाथ पकडा जा चुका है वही पंजाब के 80 प्रतिशत लोग नशे की चपेट में है । आज बच्चे, बुढे, नौजवान के साथ महिलायें भी इस नशे की जाल में फसती जा रही है ,आखिर सफल समाज एंव देश का सपना देखना बेमानी होगा । इस नशा पर कई फिल्में बनी पर इसमे सुधार की जगह ये बढता ही जा रहा है ।

नशा पर कई कानून बने लेकिन वह भी असफल रहा आखिर इसका जिम्मेदार और कोई नही हम सभी है जो इसे रोक पाने मे असमर्थ है । एन.डी.पी.सी ने जो कानून बनाए वह सख्त तो है लेकिन उसका सही इस्तेमाल ना होने से अच्छे परिणाम का कल्पना करना दिन में तारे गीनने के बराबर है । आखिरकार नशा हमारे समाज एंव देश के लिए सबसे बडा कलंक है जिसे मिटाने के लिए जरूरत है लोगों के बीच जागरूकता फैलाना । कहते है कि सरकार भी कम दोषी नही है क्योंकि उन्हें इस मादक पदार्थ मे से सबसे ज्यादा आमदनी होती है । तभी कहा गया है कि –

आपने ऐसा मसीहा देखा है क्या ?
जख्म देकर जो पूछे दर्द होता क्या ?